जॉन्डिस

बच्चों में जॉन्डिस के लक्षण ,कारण एवं निवारण

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जॉन्डिस एक ऐसी बीमारी है जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित नवजात बच्चे ही होते हैं |
वैसे ये बीमारी बच्चों से लेकर वयस्कों तक सभी को हो सकती है | पर आज हम बात करेंगे बच्चों में होने वाले जॉन्डिस की | आजकल इस बीमारी का नाम कुछ सुनने में ज्यादा ही आ रहा है ।

शायद यह हमारी हमारी गलत खान पान की आदतों का नतीजा है या फिर बदलते पर्यावरण का क्योंकि, अब न तो पर्याप्त धूप मिलती है और ना ही शुद्ध भोजन कहाँ पहले धूप हमारे छत और ऑगन से होती हुई कमरों तक आ पहुँचती थी और कहाँ आज हम अपने एसी अपार्टमेन्ट में सूर्य भगवान के दर्शन को भी तरस जाते हैं । जिसके परिणाम स्वरूप बच्चे पैदा होने से पूर्व ही बीमारियों का शिकार हो जाते हैं ,जाॅन्डिस उन्हीं में से एक बीमारी है। गर्मी में तो फिर भी नवजात को जाॅन्डिस होने की संभावनाएं कम होती है पर सर्दी मैं जॉन्डिस का प्रकोप बहुत ज्यादा बढ़ जाता है ।

पीलिया(जाॅन्डिस ) होता क्या है

जॉन्डिस होने का मुख्य कारण बिलीरुबिन नामक पदार्थ है जिसका निर्माण शरीर के ऊतकों और रक्त में होता है ।जब लिवर में लाल रक्त कोशिकाएं होती है तो पीले रंग का बिलीरुबिन नामक पदार्थ बनता है । जब यह बिलीरुबिन रक्त से लिवर की तरफ जाता है तो लीवर द्वारा फिल्टर करके शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है |

जब यह बिलुरुबिन शरीर से बाहर नहीं निकल पाता तो जाॅन्डिस होता है | ।बच्चे के शरीर में बिलीरुबिन ज्यादा बनता है क्योंकि बच्चे के शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं बहुत बनती है और बहुत ज्यादा टूटती भी है लेकिन बच्चे के शरीर का लिवर इतना विकसित नहीं होता । जिस के कारण बच्चे के शरीर का बिलुरुबिन लिवर के माध्यम से छनकर शरीर से बाहर नहीं जा पाता । इसी वजह से बच्चे के रक्त में बिलुरुबिन की मात्रा अधिक हो जाती है । ऐसी स्थिति को जोंडिस कहते हैं । इस बीमारी में बच्चे की त्वचा का रंग पीला हो जाता है बच्चा कमजोर हो कुपोषित होने लगता है जाॅन्डिस का अगर उचित उपचार न किया जाए तो बच्चे की मृत्यु भी हो सकती है ।

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जाॅन्डिस एक ऐसा रोग है जिसमें सीरम बिलिरुबिन का स्तर 3 मिलीग्राम 20 प्रति डेसीलीटर से ऊपर बढ़ जाता है ।
इसके मुख्य लक्षण में आंखों के सफेद हिस्से म्यूकस मेंब्रेन और त्वचा का रंग पीला पड़ जाता है। आमतौर पर जाॅन्डिस नवजात शिशु को होता है लेकिन कुछ मामलों में बड़े बच्चों एवं व्यस्को में भी देखा गया है | जॉन्डिस के कुछ अन्य लक्षण भी होते हैं जैसे पेट में दर्द भूख न लगना, उल्टी आना, वजन घटना, बुखार आदि।

जॉन्डिस के लक्षण

  1. जाॅन्डिस के कारण त्वचा रूखी और पीली हो जाती है ।
  2. जाॅन्डिस में आँखे पीली हो जाती है
  3. जॉन्डिस में लगातार बुखार आता है
  4. जॉन्डिस में नाखून ,हथेली मसूड़ों का रंग पीला हो जाता है
  5. शिशु चिड़चिड़ाने लगता है
  6. शिशु लगातार रोता रहता है
  7. शिशु को भूख कम लगती है
  8. जॉन्डिस के कारण वजन में कमी
  9. जॉन्डिस के कारण उल्टी व मतली
  10. जाॅन्डिस में बच्चे का स्टूल हल्के रंग का होने लगता है
  11. जॉन्डिस के कारण बच्चे के पेट ने दर्द रहता है
  12. जॉन्डिस के कारण बच्चे के सर में दर्द रहता है
  13. जॉन्डिस के कारण बच्चे को गहरे रंग का मूत्र आता है
  14. जॉन्डिस के कारण बच्चे के शरीर में जलन होने लगती है
  15. जाॅन्डिस के कारण बच्चे के शरीर में खुजली होने लगती है

जॉन्डिस के दुष्परिणाम एवं निवारण

बच्चों में जॉन्डिस के इलाज के लिए फोटो थेरेपी की जाती है । कुछ मामलों में खून भी चढ़ाया जाता है व्यस्को में पीलिया का कारण बनने वाली परिस्थितियों का निवारण किया जाता है। दवाई दी जाती है और कुछ मामलों में ऑपरेशन भी होता है यदि जॉन्डिस का इलाज न किया जाए तो यह मस्तिष्क को प्रभावित कर देता है । जाॅन्डिस के कारण लिवर काम करना बंद कर देता है ।
जॉन्डिस के कारण तेज बुखार आता है जॉन्डिस के कारण बच्चे के शरीर का तापमान बढ़ जाता है | तापमान अक्सर १०१ डिग्री से ऊपर ही रहता है यह बच्चे के शरीर में हो रहे संक्रमण के कारण होता है |

जॉन्डिस के कारण बच्चे को केनिकेटरर नामक बीमारी हो जाती है

यह बीमारी बच्चे के दिमाग को नुकसान पहुंचा सकती है | केनिकेट्रर रोग में बच्चों की आँखें और शरीर पीला पड़ जाता है, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बच्चे का शरीर के सभी अंग अभी पूरी तरह से काम नहीं कर पाते | उसका मस्तिष्क,,, लीवर किडनी दिल आदि सभी अंग अभी अर्ध विकसित अवस्था में होते हैं | बच्चे का लीवर पूरी तरह से काम ना कर पाने के कारण रक्त में मौजूद बिलीरुबिन को छान नहीं पाता ।

जॉन्डिस का पता कितने दिनों में लगता है

जॉन्डिस के लक्षण नवजात शिशु में 5 दिनों के अंदर ही पता चल जाते हैं | जन्म के बाद अगर बच्चे में जॉन्डिस के लक्षण दिखते हैं तो बच्चे को शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर की निगरानी में रखते हैं | बच्चे में पीलिया रोग के लक्षण बहुत हल्के होते हैं और लगभग 2 सप्ताह बाद खुद ही समाप्त हो जाते हैं | अधिकतर बच्चों में जॉन्डिस खतरनाक स्तर तक नहीं पहुँचता और उपचार के दो से तीन हफ्ते में पूरी तरह ठीक हो जाता है लेकिन अगर उपचार न किया जाए तो बिलीरुबिन की अधिकता बच्चे के मस्तिष्क को नुकसान पहुंचा सकती है | इसी स्थिति केनिकेटरर कहते हैं। इस स्थिति में बच्चे का दिमाग छतिग्रस्त हो सकता है और बच्चे की मृत्यु भी हो सकती है ।

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क्या जॉन्डिस किसी और वजह से भी हो सकता है

जाॅन्डिस कुछ विशेष परिस्थितियों में विशेषकर बच्चों में जाॅन्डिस विभिन्न कारणों से हो जाता है । जैसे कि किसी संक्रमण के कारण , पाचन तंत्र की गड़बड़ी के कारण ,।या फिर मां और बच्चे के रक्त के प्रकार की समस्या के कारण ।

मुख्य तौर से जाॅन्डिस तीन प्रकार के होते हैं

हेमोलिटिक जाॅन्डिस

अगर लाल रक्त कण कोशिकाएं समय से पहले टूट जाती है तो लो बिलीरुबिन काफी मात्रा में बन जाता है जिसे लिवर फिल्टर नहीं कर पाता इसी कारण से आँखें और त्वचा पीली दिखने लगती है । यह स्थिति अनुवांशिक या कुछ दवाइयों के दुष्प्रभाव के कारण हो सकती है।
इसके मुख्य कारणों में मलेरिया, थैलेसीमिया ,एनीमिया, गिलबर्ट स्ट्राोक आदि अन्य कई अनुवांशिक कारण हो सकते हैं |

हेपिटोसेलुलर जाॅन्डिस

नवजात शिशुओं में लिवर पूरी तरह से विकसित नही हो पाता । जिसके कारण लिवर में
वो एंजाइम जो बिलीरुबिन को छानते हैं । पूरी तरह से विकसित नही हो पाते । इसके कारणों में शरीर में एसिडिटी बनना अधिक मसालेदार भोजन का सेवन करना हो सकता है।

पोस्ट-हैपेटिक जॉन्डिस या ऑब्स्ट्रक्टिव जॉन्डिस

जिसमें पित्त नलिका में रुकावट के कारण बिलुरुबिन का स्तर बढ़ जाता है ।यह बिलीरुबिन मूत्र में फैलने से मूत्रं का पीला हो जाता है इस पीलिया को पोस्ट हेपेटिक जाॅन्डिस कहते हैं ।
इसके मुख्य कारण निम्न हो सकते हैं

बच्चे का समय पूर्व जन्म हो सकता है

38 हफ्ते से पहले पैदा होने वाला बच्चे का लिवर बिलीरुबिन को छानने की प्रक्रिया को पूरी तरह से करने में सक्षम नही हो पाता । अविकसित बच्चा कम खाता है और कम ही स्टूल निष्कासन करता है । जिसके परिणाम स्वरूप मल के माध्यम से कम बिलीरुबिन का निष्कासन शरीर से होता है।

जन्म के दौरान चोट

नवजात शिशु को अगर प्रसव के समय चोट लगती है तो उसके शरीर से लाल रक्त कणिकाएं टूटती हैं जिसके कारण बिलीरुबिन का स्तर बढ़ जाता है

रक्त का प्रकार

यदि मां के रक्त का प्रकार बच्चे के रक्त के प्रकार से भिन्न होता है । बच्चों को प्लेसेंटा के माध्यम से एंटीबॉडी प्राप्त होती है । जिससे कि बच्चे की रक्त कोशिकाएं और अधिक तेजी से टूटने लगती है ।

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स्तनपान न मिलने के कारण

वो नवजात शिशु जिन्हें अपनी मां का दूध नहीं मिल पाता । या उन्हें अपनी मां के स्तनपान से संपूर्ण पोषण नहीं मिल पाता । उन्हें पीलिया होने का खतरा होता है |

जाॅन्डिस का पता नवजात में कैसे चलता है

जॉन्डिस के लक्षण आमतौर पर नजर आने लगते हैं । नवजात को जब चेकअप के लिए डॉक्टर के पास ले जाते हैं । डॉक्टर स्वयं ही शिशु के लक्षणों को देखकर खून की जांच कराते हैं ताकि खून में मौजूद बिलीरुबिन की मात्रा का पता लगाया जा सके।

  • बच्चे के शरीर में जॉन्डिस के लक्षण अगर तेजी से फैल रहे हैं ।
  • बच्चे का बुखार अगर 100 डिग्री फारेनहाइट से अधिक है ।
  • बच्चे की सेहत दिन पर दिन गिरती जा रही है ।
  • बच्चे के यूरिन का रंग गहरा पीला हो रहा है |
  • तब हमें बिना विलंब किए डॉक्टर के पास जाना चाहिए।
  • कुछ बहुत ही जटिल परिस्थितियों में बिलीरुबिन की मात्रा रक्त में 25mg को पार कर जाती है अगर जाॅन्डिस को इसी समय न रोका गया तो यह बच्चे को बहरा बना सकता है ।

जॉन्डिस का उपचार कैसे होता है

जॉन्डिस के इलाज की आवश्यकता अधिकतर बच्चों में नहीं पड़ती ।बच्चों को सिर्फ धूप दिखाने से , उन की मालिश करने से। हल्का फूलका जॉन्डिस एक-दो सप्ताह के अंदर अपने आप समाप्त हो जाता है । बच्चे का शरीर कुछ दिनों में अपने आप को विकसित कर लेता है । बच्चे के शरीर का लिवर विकसित होकर बिलीरुबिन को छान कर निकालने लगता है । लेकिन जिन बच्चों में जॉन्डिस के लक्षण बहुत ज्यादा होते हैं ।उन बच्चों का इलाज फोटो थेरेपी के द्वारा किया जाता है इस प्रक्रिया में नवजात बच्चे के शरीर को फ्लोरोसेट रोशनी में रखा जाता है । और फ्लोरोसेंट रोशनी के कारण शरीर में मौजूद बिलीरुबिन टूटने लगते हैं कुछ अन्य परिस्थितियों में बिलीरुबिन शरीर में खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है इस स्थिति में बच्चे को खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ने लगती है।

जाॅन्डिस के घरेलू उपचार

अगर बच्चे को जाॅन्डिस की शुरुआत हुई है तो कुछ दिनों तक दिन में चार-पांच बार 15 मिनट तक धूप दिखाने से काफी लाभ होता है। किसी इलाज के बिना ही धूप दिखाने भर से ही बच्चा स्वस्थ हो जाता है । बच्चे को शीशे की खिड़की के बगल में रखकर धूप दिखानी होती है । ताकि बच्चे पर सीधे धूप न पड़े और खिड़की के शीशे से धूप छनकर बच्चे तक आए ।
इसके अलावा बच्चे को स्वच्छ वातावरण में रखा जाए उसे उचित एवं संतुलित आहार दिया जाए तो भी जाॅन्डिस जल्दी ठीक होता है |

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