गर्भावस्था के लक्षण और गर्भस्थ शिशु का विकास

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बच्चे के जन्म को सृष्टि का सबसे सुबसूरत नियमो में से एक माना जाना है। औरत माँ बनकर अपने आप को सम्पूर्ण महसूस करती है। गर्भावस्था के ये नौ महीने स्त्री के जीवन मे काफी बदलाव लाता है। इन नौ महीनों में औरतो में काफी हार्मोनल आते है, जिसकी वजह से उनके शरीर मे भी काफी बदलाव होते है, जो उनके स्वभाव और सेहत को भी काफी प्रभावित करता है। गर्भावस्था का छत्तीस से चालीस सप्ताह तक चलने वाला ये सफर हर वक्त एक नई अनुभूति का अनुभव करवाता है।

इस लेख के द्वारा मैं गर्भावस्था के हर पड़ाव के बारे के जानकारी देने की कोशिश कर रही हूँ। गर्भावस्था के नौ महीनों को तीन टाइमेस्टर में बाटा जाता है। पहले टाइमेस्टर ,एक से तीन माह तक ( 1हफ्ते से 12 हफ्ते) का समय होता है, जो कि गर्भावस्था का पहला पड़ाव होता है। दूसरा टाइमेस्टर चार से छह माह (13 हफ्ते से 28हफ्ते )का समय होता है, ये गर्भावस्था का दूसरा पड़ाव होता है और तीसरा टाइमेस्टर सात से नौ माह ( 29 हफ्ता से 40 हफ्ता ) का समय होता है। ये गर्भावस्था के तीसरा और अंतिम पड़ाव होता है। इन तीनो पड़ाव की जानकारी गर्भवती महिला को होनी चाहिए। इन महीनों में गर्भवती महिला का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस लेख के द्वारा मैं गर्भवस्था के लक्षणों , गर्भस्थ शिशु के विकास और इस दौरान बरती जाने वाली सावधानियों की चर्चा करूँगी।

गर्भावस्था के पहला महीना

गर्भावस्था के पहले महीने में महिलाओं को अपने माहवारी आने के पहले जैसे संकेत दिखाई देते है। मूड चिड़चिड़ा होना, स्तनों का कड़ा हो जाना, खून के हल्के धब्बे दिखना, कमजोरी महसूस होना ,थकान महसूस होना, कुछ खानों को देख कर उल्टियां होना । कहा जाता है , मानव शरीर की रचना त्रुटिहीन है, अगर शरीर मे कुछ भी बदलाव होता है, तो हम असहज महसूस करने लगते है। कुछ ऐसा ही अनुमान गर्भावस्था के पहले महीने में होता है।

अगर ऐसी स्थितिया उतपन्न होती है तो , खून या यूरिन टेस्ट करवा कर प्रेगनेंसी को निश्चित किया जाता है। ये गर्भावस्था को जांचने बिल्कुल सटीक तरीका है।

गर्भावस्था के पहले सप्ताह में भ्रूण का प्रत्यारोपण होने के बाद अंडे निषेचित हो जाते है। और इनका विकास होने लगता है। इस महीने के अंत तक बच्चे का आकार एक संतरे के बीज जैसा होता है। और चेहरा बनने की प्रकिया शुरू हो जाती है। इस महीने गर्भवती महिला को कोई भी भारी सामान उठाने से बचना चाहिए। और खान पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

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गर्भावस्था के दूसरा महीना

गर्भावस्था के दूसरे महीने में महिला गर्भधारण के लक्षण साफ नजर आने लगते है। बच्चे का जरूरी अंग भी बन चुके होते है। इस महीने भी पहले महीने जैसे ही लक्षण नजर आते है। बच्चे का आकार इस महीने बढ़कर जामुन के बीज जैसा हो जाता है। अब गर्भ का आकार भी बढ़ना शुरू हो जाता है। जिसकी वजह से बार -बार यूरिन की इच्छा होती है। सीने में जलन की समस्या भी होने लगती है और शरीर मे बदलाव होने के साथ थोड़ा वजन भी बढ़ता है।
छह हफ्ते यानी डेढ़ महीने की गर्भावस्था के बाद डॉक्टर की सलाह पर गर्भवती महिला स्कैन परीक्षण करवा सकती है । बच्चे का सीना भी बन गया होता है, इसलिए बच्चे के धड़कन की आवाज अल्ट्रासाउंड के दौरान सुनी जा सकती है।

गर्भावस्था का तीसरा महीना

गर्भावस्था के तीसरे महीने में बच्चा अब अपना आकर लेने लगता है, और साथ ही गर्भपात का ख़तरा भी अब कम हो जाता है। इस महीने बच्चे का आकार एक छोटे नींबू के आकार का हो जाता है और वो हिचकियां लेने लगता है और अपना अंगूठा चूसने की कोशिश करने लगता है। ये महसूस तो नही होता पर अल्ट्रासाउंड के द्वारा ये देखा जा सकता है।
इस महीने अल्ट्रासाउंड के द्वारा डाक्टर परीक्षण करके बच्चे के मष्तिक के विकास की जानकारी लेते है। इस महीने बच्चो के डाउन सिंड्रोम की जांच करवाई जाती है।
इस महीने के अंत तक गर्भावस्था के पहला तिमाही पूरा होने लगता है। गर्भवती स्त्री अब थोड़ा पहले से बेहतर महसूस करती है। अब कुछ खाने की इच्छा होने लगती है। गर्भावस्था के सफर का अब नया अध्याय शुरू हो जाता है। इस महीने पेट तो ज्यादा नही निकलता पर,आप अपने बच्चे को अनुभव करने लगते है।

गर्भावस्था का चौथा महीना

चौथे महीने से गर्भावस्था के दूसरे टाइमेस्टर की शुरुआत हो जाती है। बच्चा अब तेजी से विकास करने लगता है। इस महीने उसका आकार एक संतरे के समान हो जाता है । अब बेबी बंप भी दिखने लगता है। अमूमन इस महीने से बच्चे का गर्भ में गतिविधि करने लगते है। और आवाज भी सुनने लगते है।

बहुत सी महिलाओ को इस महीने से पहले टाइमेस्टर की परेशानियां से, जैसे जी मिचलाना, मार्निग सिकनेस जैसी समस्या से राहत मिलती है। अब थोड़ी – बहुत भूख भी महसूस होती है। लेकिन गर्भवती महिला को इस महीने से खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए । बाहर का खाना से परहेज करना चाहिए। समय -समय पर चिकित्सक से सलाह लेते रहना चाहिए।

गर्भावस्था का पांचवा महीना

गर्भावस्था के पांचवे महीने तक बच्चे के सभी अंग बन गए होते है, वो अब गर्भ के अंदर अपने अंग को उपयोग करने की कोशिश करता है।इस महीने तक बच्चे का आकार एक बड़े टमाटर जैसा हो जाता है। अंगूठा चूसना, अंगड़ाई लेना , जम्हाई लेना शुरू कर देता है। इस समय तक बच्चे के लिंग भी विकसित हो जाता है।
अल्ट्रासाउंड के द्वारा ये पता लगया जा सकता है, लड़का है लड़की। भारत मे इस परीक्षण पर सरकार ने रोक लगाई है। चूंकि बच्चा तेजी से गर्भ में बढ़ता है तो गर्भवती महिला को अपने खान-पान का विशेष ध्यान देना चाहिए। और एक बार ज्यादा मात्रा में खाने के बजाय थोड़ी-थोड़ी देर पर खाने की आदत डालनी चाहिए।
गर्भ का आकार बढ़ने से महिलाओ को सोने में कठिनाई होने लगती है। इसलिए पैर पर तकिया लगा कर सोना चाहिए। बहुत महिलाओ में इस समय कब्ज की समस्याएं बढ़ जाती है। पानी ज्यादा पीना चाहिए। और हल्के -फुल्के व्यायाम भी करने गर्भवती महिला को करनी चाहिए। जिससे शरीर मे स्फूर्ति बनी रहे।

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गर्भावस्था का छठा महीना

गर्भवस्था का छठा महीना तक गर्भस्थ शिशु काफी सक्रिय हो जाता है। वो अपना अंगूठा चूसने लगता है। गर्भवती महिला हर समय बच्चे की गतिविधि को महसूस कर सकती है। उसके सोने के समय का भी अंदाजा लगा सकती है। इस महीने से बच्चे की लंबाई भी बढ़ने लगती है, और उसका आकार एक केले जैसा हो जाता है।
छठे महीने में गर्भवती महिला को भुख काफी लगती है। इस समय बाहर के खाने, प्रोसेसिंग फ़ूड ,जंक फूड के सेवन से बचना चाहिए। गर्भवती महिला को अपच और कब्ज की समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है। बच्चे का आकार बढ़ने की वजह से कुछ महिलाओ को बैकपेन की समस्या भी होती है। जिसके लिए कुछ आसन करने करने चाहिए।

गर्भावस्था के सातवाँ महीना

तीसरे और आखिरी टाइमेस्टर का पहला महीना यानी सातवाँ महीना । इस समय तक गर्भस्थ शिशु के सभी अंग विकसित हो जाते है। उसके फेफड़े का विकास भी हो जाता है और उसकी श्वसन प्रणाली भी विकसित हो जाती है। इस समय तक बच्चे का आकार एक भुट्टे के जैसा हो जाता है।

इन महीने गर्भवती महिला का बेबीबंप का आकार भी बढ़ जाता है, जिसकी वजह से उसे बैठने और सोने में तकलीफ भी होने लगती है।
गर्भावस्था के तीसरे टाइमेस्टर में गर्भवती महिला के विशेष देख रेख की जरूरत होती है। इस समय गर्भवती महिला के खान-पान का विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। महिला के शरीर का रक्त संचार काफी बढ़ जाता है। स्तनों में दूध बनने की प्रकिया शुरू होने लगती है। कुछ महिलाओं को हाथ-पैरों में सूजन की समस्या भी होने लगती है।

इस समय बच्चा भी धीरे – धीरे नीचे की तरफ खिसकने लगता है , जिसके कारण गर्भवती महिला को बार बार बाथरूम जाने की आवश्यकता महसूस होती है।

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गर्भावस्था का आठवां महीना

गर्भवस्था का आठवे महीने से गर्भवती महिला अपने बच्चे के आगमन की तैयारियों में लग जाती है। गर्भवस्था का ये एक अहम महीना होता है। गर्भवती महिला को अपनी दिनचर्या सही रखनी चाहिए।क्योंकी इनसब चीजो का प्रभाव बच्चे पर पड़ता है। इस महीने में बच्चे का आकार एक नारियल के गोले जैसा होता है। जिसकी वजह से वो गर्भ के ज्यादातर हिस्सा को घेरे होता है। इस कारण वो पहले से थोड़ा कम गतिविधि करता है ।

गर्भवती महिला को उसकी गतिविधियों पर ध्यान रखनी चाहिए । और कोई भी समस्या होने पर चिकित्सक की तुरन्त सलाह लेनी चाहिए। अमूमन इस महीने गर्भवती महिला के खून की जांच की जाती है। चिकित्सक की सलाह से आयरन और कैल्शियम की गोली लेना चाहिए। गर्भवती महिला को ज्यादा देर तक खड़े होकर करने वाले काम से बचना चाहिए और भरपूर नींद लेनी चाहिए।

गर्भवस्था का नौवाँ महीना

गर्भावस्था के नौवाँ महीना तक गर्भस्थ शिशु बिलकुल विकसित हो जाता है। वो एक बड़े नारियल के आकार का हो जाता है। अब बच्चा किसी भी दिन आ सकता है। आकार बढ़ने के कारण शिशु अब गर्भ में ज्यादा गतिविधि भी नही कर पाता है।
इस महीने और भी ज्यादा सावधानी की जरूरत होती है। बच्चा अब धीरे धीरे नीचे खिसकते हुए अपना स्थान लेने लगता है। जिससे योनि भाग पर ज्यादा दबाब पड़ने लगता और खुलने लगता है। जिससे गर्भवती महिला को बार बार बाथरूम जाने की इच्छा होती है। कुछ गर्भवती महिलाओं के स्तनों में भी रिसाव आने लगता है।

गर्भवती महिला का वजन भी इस महीने तक 10- 15 किलो बढ़ जाता है।
गर्भवती महिला को इस समय ज्यादातर आराम करना चाहिए। पेट के बल झुक कर कोई आराम करने से बचना चाहिए। इस समय कुछ महिलाओं में बैकपेन की समस्या ज्यादातर बढ़ जाती है। लेकिन पेट या पेरू में किसी भी प्रकार के दर्द होने या पानी की थैली फटने पर डॉक्टर से दिखाना चाहिए। क्योंकि ये प्रसव कर संकेत हो सकते है।

गर्भवस्था के इन नौ महीने के विभिन्न लक्षण गर्भवती महिला को अपने बच्चों से जोड़ता है। इन महीनों में गर्भवती महिला के स्वाथ्य पर ध्यान देने के साथ उन्हें खुश भी रखना चाहिए। उन्हें ज्यादा चिंतित नही रहना चाहिए। अच्छी और ज्ञानवर्धक पुस्तके पढ़नी चाहिए । क्योंकि माँ के व्यवहार का असर गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है।
आशा है , मेरे इस लेख के द्वारा गर्भावस्था के विभिन्न अवस्थाओं को समझने और और गर्भस्थ शिशु के विकास के विभिन्न चरणों की उचित जानकारी प्रदान करेगी।

–  पम्मी राजन
कोलकता

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