गर्भावस्था के दौरान धड़कन क्यों बढ़ जाता है?

गर्भावस्था के दौरान धड़कन क्यों बढ़ जाता है?

गर्भावस्था का एक लक्षण दिल की धड़कन का बढ़ जाना भी है, दिल की धड़कन बढ़ना कई बार माँ और बच्चे के लिए मुश्किले पैदा कर सकती है। गर्भावस्था के दौरान एक महिला को बहुत देखभाल की जरूरत होती है, स्पेशली अगर महिला पहली बार माँ बन रही हो तो क्योंकि उसे किसी भी चीज़ का अंदाज़ा नही होता और हर बदलाव को लेकर वो बहुत ही असमंजस की स्थिति में होती है।




इसलिए जरूरी है कि गर्भवती महिला को कुछ सामान्य बातो की जानकारी हो जिससे वह बेवजह चिंतित ना हो। इन्ही में से एक बदलाव है गर्भावस्था में धड़कन का असामान्य होना, अगर प्रेग्नेंट महिला की हार्ट रेट और पल्स रेट सामान्य से ज्यादा है तो धड़कन असामान्य कही जाएगी।



असामान्य धड़कन भी दो प्रकार की होती है साइनस और नॉन साइनस, साइनस धड़कन भी दो प्रकार की होती है नॉर्मल और एब्नॉर्मल । नॉन साइनस धड़कन भी दो प्रकार की होती है वेंट्रिकुलर और सुपरवेंट्रिकुलर। वेंट्रिकुलर हार्ट के लोअर चैम्बर से आती है और सुपरवेंट्रिकुलर हार्ट के अपर चैम्बर से।




प्रेग्नेंसी में कई बार धड़कन 100 बीट प्रति मिनट पहुँच जाती है, गर्भावस्था में हुए बदलावो के कारण प्रेग्नेंट महिला के हृदय पर तनाव बढ़ता है और इस तनाव को मैनेज करने में दिल की धड़कन बढ़ जाती है। तो आइए जानते है धड़कन बढ़ने या असामान्य होने के क्या कारण हो सकते है।

गर्भावस्था में शिशु की धड़कन का शुरू होना

गर्भावस्था के दौरान धड़कन क्यों बढ़ जाता है?
गर्भावस्था के दौरान धड़कन क्यों बढ़ जाता है?

शिशु का हृदय चौथे हफ्ते तक बनना शुरू होता है। लेकिन धड़कन आप केवल 6 सप्ताह के बाद अल्ट्रासाउंड द्वारा ही सुन सकते हो।

गर्भावस्था के दौरान हार्ट बीट कितनी होती है

बच्चे की हार्टबीट बड़े लोगों के मुकाबले लगभग दो गुनी होती है। शुरू में 100 धड़कन प्रति मिनट और नवे सप्ताह तक 175 से 180 धड़कन प्रति मिनट तक पहुँच जाती है। गर्भावस्था कम्पलीट होने पर 150 से 160 धड़कन प्रति मिनट पर आ जाती है। अगर पहले तीन महीनों में हार्ट बीट 100 प्रति मिनट से कम होती है तो बहुत निगरानी की जरूरत होती है अन्यथा गर्भपात का अंदेशा होता है।

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गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड कितनी बार

एक सामान्य गर्भावस्था में सोनोग्राफी पहली, दूसरी और तीसरी तिमाही में की जाती है। यदि कोई कॉम्प्लिकेशन दिखाई देती है तो डॉक्टर कुछ और अल्ट्रासाउंड भी करवा सकती है । पहली तिमाही में बच्चे के जन्म की तिथि,जुड़वा बच्चे त्तथा छटे सप्ताह में शिशु के हृदय की धड़कन सुनी जाती है । दूसरी तिमाही में बच्चे के जन्मजात दोषों का पता चलता है जैसे डाउन सिंड्रोम
तीसरी तिमाही में देखा जाता है कि बच्चे की शारीरिक रचना में किसी प्रकार की कोई विसंगति तो नही है।

गर्भावस्था के दौरान हार्ट बीट बढ़ने के कारण

प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन

प्रेग्नेंट महिला में जो भी फिजिकल और इमोशनल बदलाव दिखते है वो प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन के कारण होते है।
सामान्यतया प्रोजेस्टेरोन के कारण दिल की धड़कन बढ़ जाती है क्योंकि प्रेग्नेंट लेडी में ब्लड अमाउंट बढ़ने से पहले ही गर्भाशय में ब्लड सर्कुलेशन के लिए पर्याप्त मात्रा में ब्लड हो जाता है जिससे दिल का काम फ़ास्ट और मुश्किल हो जाता है।
इससे कभी कभी घबराहट होती है और हार्ट बीट बढ़ जाती है।

गर्भावस्था के दौरान तनाव

गर्भावस्था और तनाव का बहुत गहरा सम्बन्ध है, शारीरिक और मानसिक तौर पर हो रहे बदलाव भी तनाव का कारण बनते है।
बढ़ता वजन,रोजमर्रा के कामो में रूकावट, नींद ना पूरी होना, खाने का मन ना करना ये सब भी तनाव का कारण बनते है।
पर सबसे बड़ा कारण होता है गर्भवती महिला की अपने शिशु को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता।
क्या होगा,कैसे होगा, सब ठीक से निपटेगा या नही ये सब विचार तनाव देकर हृदय का बोझ बढ़ा कर हार्ट बीट बढ़ा देते है।

ब्लड की ज्यादा मात्रा

एक सामान्य महिला की तुलना में गर्भवती महिला में ब्लड की मात्रा पचास प्रतिशत होती है, जिससे भ्रूण को पर्याप्त मात्रा में पोषण पहुँच सके लेकिन इस कारण हृदय को ज्यादा मात्रा में ब्लड पंप करना पड़ता है और हृदय पर इस वर्कलोड के कारण धड़कन असामान्य हो जाती है।

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कैफीन का सेवन

आपने सुना होगा कि नींद आ रही हो तो चाय या कॉफी पी लेनी चाहिए। ऐसा इसलिए कहते है क्योंकि इनमें उपस्थित कैफीन सेंट्रल नर्वस सिस्टम को उत्तेजित कर देता है जिससे हृदय गति पर भी प्रभाव पड़ता है।

सपप्लिमेंट्स

गर्भावस्था के दौरान महिला को डॉक्टर के बताए मेडिसिन और सपप्लिमेंट्स के अलावा अपने आप कोई भी सप्लीमेंट नही लेना चाहिए। कई बार अवसाद या तनाव में लिए जाने वाले इस प्रकार के सप्लीमेंट हृदय की गति को बहुत ज्यादा ट्रिगर करते है। तो गर्भावस्था के दौरान इनसे बचे।

  • असामान्य धड़कन ले कुछ अन्य कारण है निम्नलिखित है
  • खून की कमी
  • गर्भावस्था में थाइरोइड
  • जरूरत से ज्यादा वजन बढ़नालंग्स में ब्लड क्लोटिंग
  • अस्थमा की बीमारी
  • लंग्स इन्फेक्शन
  • जरूरत से ज्यादा काम करना
  • किसी भी तरीके का बुखार
  • शरीर में पानी की कमी

असामान्य धड़कनों के लक्षण

अचानक चक्कर आना या बेहोश हो जाना, सीने में दर्द,सांस लेने तकलीफ होना, थकान महसूस होना, शरीर के कुछ हिस्सों का सुन्न लगना ।

सावधानी तथा उपचार

आहार

गर्भावस्था में वजन बढ़ना सबसे सामान्य बात है लेकिन गर्भवती महिला को अपना वजन जरूरत से ज्यादा नही बढ़ने देना चाहिए। गर्म तासीर वाली चीज़े जैसे पपीता,चीकू, नही खानी चाहिए। गैस, अपच से बचने के लिए भारी और तला हुआ कम से कम खाए। जंक फूड, कैफीन, एल्कोहल, छोड़ दे। जरूरत से ज्यादा मीठा भी आपको नुकसान करेगा। विटामिन्स और मिनरल्स का सेवन अच्छे से करना चाहिए। फोलिक एसिड युक्त पदार्थ,हरि सब्जियां, विटामिन c, और चावल आदि का सेवन शुरू कर देना चाहिए। विटामिन और मिनरल्स से भरपूर चीज़े खाए, पोषक तत्वों से भरपूर सब्जियां और फल खाए।

डेयरी प्रोडक्ट के साथ साथ रेड मीट,हरी सब्जियां खाए। कैल्शियम ,प्रोटीन,आयरन से बच्चे के मसल्स,ऊतकों और हड्डियों का विकास होता है। हैल्थी खाने से हार्मोनल बदलाव से होने वाली समस्याए भी दूर होती है। डॉक्टर ने फोलिक एसिड का जो सप्पलीमेंट दिया है वो रेगुलर लेती रहे। जिंक का सेवन बढ़ा दे, कम से कम 15 मिलीग्राम रोज ले, साबुत अनाज, सूखे मेवे जिंक के अच्छे स्त्रोत है। इसकी कमी से प्रसव में दिक्कत हो सकती है।

दूध, दही, पनीर, साबुत अनाज, दाल, हरी सब्जियां, विटामिन c वाले फल, खूब पानी पिएं, छटे हफ्ते में कम से कम 1000 मिलीग्राम कैल्शियम का सेवन करना चाहिए। सुबह निम्बू पानी या नारियल पानी पिए, ब्रोकली, भिंडी,दाल, पालक, एवाकाडो खाए क्या ना खाएं वजन बढ़ाने, गैस्ट्रिक, ज्यादा मीठा, ज्यादा नमक ना खाएं। मछली,सोयापनीर, माँस , अंडा, मीट चिकेन, बीन्स, टोफू खाए अधपका माँस, कच्चा अंडा, पपीता, सी फूड, कुकीज, केक, डोनट्स, जैतून, कनोला, मक्का का तेल, नट, बीज का सेवन ना करे। शराब या अल्कोहल और स्मोकिंग छोड़ दे, चाय कॉफी भी बन्द कर दे या कम कर दे ।आलूबुखारा, अनार, गाजर और पालक का रस असामान्य धड़कनों के फायदेमंद होता है।

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व्यायाम

शुरुआती हफ़्तों में आप सुबह 30 मिनट टहल सकती है ये आपके और बच्चे दोनो के लिए लाभकारी है। हल्का व्यायाम करें। केवल गर्भावस्था में होने वाले योग करे,सांस रोकने और पेट पर जोर डालने वाले योग और एक्सरसाइस ना करे। ज्यादा उछल कूद ना करें, यात्रा से बचे। थोड़ा समय बीतने पर टहलने का समय बढ़ा दे। योग्य शिक्षक की देखरेख में या उनके कहे अनुसार ही व्यायाम या योग करे। पीठ के बल लेटकर करने वाली एक्सरसाइज बन्द कर दे।

आरामदायक पोजीशन में रहे, वार्मअप जरूर करे, हॉर्मोन शरीर को लचीला बनाते है आप वार्मअप से शरीर को और लचीला बना सकती है, ज्यादा उछल कूद न करें शरीर के साथ जबरदस्ती ना करें। टहलते रहे,ज्यादा देर तक खड़े ना रहे ना खड़े होने वाली एक्सरसाइज ना करे।

पांचवे हफ्ते में स्विमिंग कर सकते है पर वजन उठाने वाली एक्सरसाइज ना करे। छटे और सातवें हफ्ते में वाटर एरोबिक्स कर सकती है । पेटदर्द, वेजिनल ब्लीडिंग में व्यायाम ना करें। आठवें से दसवें हफ्ते में पालथी मारे दिन में 5 बार 30 सेकंड तक, इससे प्रसव पीड़ा में कमी आएगी । पेट के बल ना झुकें।

तनाव से दूर रहे

आरामदायक वस्त्र पहनें, खुश रहे क्योंकि आपकी मानसिक स्थिति का असर आपके बच्चे पर होगा।  नकारात्मक विचारों से दूर रहे ये आपके होने वाले बच्चे के लिए ठीक नही है। काम के लिए भागदौड़ या जल्दबाजी ना करे। बुरी आदतों को छोड़ दे।
खुश रहे म्यूजिक सुने। सुबह सुबह नंगे पैर हरी घास पर चले।




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